श में समान नागरिक संहिता (यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड) पर चल रही बहस ने एक महत्वपूर्ण मोड़ ले लिया है.
भारत
के विधि आयोग ने पर्सनल लॉ और यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड को लेकर कंसल्टेशन
पेपर जारी करते हुए कई सुझाव पेश किए हैं. इसके तहत कहा गया है कि
यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड इस स्टेज पर न तो ज़रूरी है और न ही वांछनीय.
इस बारे में विस्तार से जानने के लिए बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद ने नैल्सार यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ के वाइस चांसलर डॉक्टर फ़ैजान मुस्तफ़ा से बात की.
लॉ कमीशन ने वही बात कही है जो मैं कई सालों से लिखता आया हूं. मेरा
हमेशा ये मानना रहा है कि भारत जैसा बड़ा देश, जिसे 'विविधता' से परिभाषित
किया जाता है, जो देश इतना बड़ा है कि उसे उपमहाद्वीप कहा जाता है, उस देश
में यूनिफ़ॉर्म यानी एक जैसा क़ानून बनाए जाने का मक़सद नहीं होना चाहिए.
मक़सद
ये होना चाहिए कि क़ानून 'जस्ट' यानी न्यायपूर्ण हो. हमें ये देखना होगा
कि क्या हमारा क़ानून 'जेंडर जस्ट' है? क्या ये महिलाओं और दूसरे जेंडर के
लोगों के साथ न्याय करता है? मैंने पहले भी कहा है कि हमें 'यूनिफ़ॉर्म
कोड' नहीं बल्कि 'जस्ट कोड' चाहिए.
दूसरी बात ये कि अगर हमारा मक़सद क़ानून में सुधार करना है और हम एक
झटके में यकायक यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की बात करेंगे तो कट्टरपंथी इस पूरी
बहस को हाईजैक कर लेंगे. क्योंकि दक्षिणपंथी ताक़तें यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड
को इस तरीके से इस्तेमाल करते हैं जैसे आप एक अलग पर्सनल लॉ का पालन करके
बड़ा जुर्म कर रहे हैं और अब एक यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड लाकर आपको देख लिया
जाएगा.
इसलिए इसके बजाय हम टुकड़ों में छोटे-छोटे सुधार करें. कभी शादी की उम्र
के बारे में सुधार कर दें, कभी तलाक़ के बारे में सुधार कर दें और कभी
शादी के रजिस्ट्रेशन के बारे में सुधार कर दें. इससे इतना विरोध नहीं
होगा. यानी, सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.
मैं ये समझता
हूं कि लॉ कमीशन ने भारत की विविधता को देखते हुए बहुत अच्छी बात कही है.
यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड का मक़सद अभी बहुत दूर है.
अभी की प्राथमिकता
ये होनी चाहिए कि अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ में सुधार हो. चाहे वो
मुसलमानों का पर्सनल लॉ हो या हिंदुओं का या ईसाइयों का. लॉ कमीशन ने बहुत
ही व्यावहारिक बात कही है.
मैंने लॉ कमीशन के पूर्व चेयरपर्सन जस्टिस चौहान के साथ काम किया है. वो
बहुत सुलझे हुए शख़्स हैं, उन्होंने बहुत अच्छी रिपोर्ट दी है.
सरकार अगर वाक़ई पर्सनल लॉ में सुधार करना चाहती है तो उसे लॉ कमीशन का सुझाव मानना चाहिए.
मिसाल
के लिए, हिंदू कोड बिल की बात करें तो यह साल 1954-55 में बना लेकिन इससे
पहले साल 1941 में 'हिंदू लॉ रिफ़ॉर्म कमेटी' बनाई गई थी जिसकी रिपोर्ट आई
और उस पर बहस हुई.
रिपोर्ट की सिफ़ारिशें एक बार में पास नहीं हो
पाईं. डॉक्टर आंबेडकर उस वक़्त क़ानून मंत्री थे और वो उसे पास नहीं करा
पाए. उसे तीन बार में पास करवाया गया.
डॉ. आंबेडकर पर ये आरोप लगाए
गए कि वो हिंदू धर्म को ख़त्म करना चाहते हैं, वो बदला ले रहे हैं. इससे
ये पता चलता है कि सुधार मुश्क़िल ज़रूर होते हैं.
इतने समय से यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की बात हो रही है लेकिन 70 सालों में
कोई सरकार इसका एक ड्राफ़्ट नहीं पेश कर पाई. अगर आप वाक़ई मुस्लिम पर्सनल
लॉ में सुधार करना चाहते हैं तो पहले एक एक्सपर्ट कमेटी बनाइए, जैसा हिंदू
कोड बिल के लिए बनाया गया.
इसलिए पहले एक कमेटी बनाइए, उसकी
सिफ़ारिशें आने दीजिए. उस पर बहस होने दीजिए और अगर बदलाव लागू होने तय
होते हैं तो उन्हें लागू करिए. अगर ये सब उस समुदाय के साथ मिलकर होगा तो
उसकी स्वीकार्यता बहुत बढ़ जाएगी. हज क़ानून बदलने से समाज में तब्दीली नहीं आती. अगर समाज में तब्दीली
लानी है तो उसके लिए समाज को तैयार करना होगा, समाज को शिक्षित करना होगा. हमने उस समाज को शिक्षित करने के लिए कौन से कदम उठाए हैं, वो अभी साफ़
नहीं है.
अगर हम सच्चे दिल से, समाज में ध्रुविकरण किए बिना पर्सनल
लॉ में रिफ़ॉर्म करना चाहते हैं तो पहले एक एक्सपर्ट कमेटी बनाएं और उस पर
सार्वजनिक रूप से बहस हो. इन सबके बाद ही हम यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की ओर
बढ़ सकते हैं.
यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड समवर्ती सूची का हिस्सा है, यानी उस पर केंद्र भी
क़ानून बना सकता है और राज्य भी. यानी भारत के 29 राज्यों में 29 अलग-अलग
क़ानून हो सकते हैं.
हम समझते हैं कि हिंदू लॉ पूरे देश में एक जैसा
है, लेकिन वो नहीं है. क्रिमिनल लॉ भी पूरे देश में एक जैसा नहीं है,
भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) भी पूरे देश में एक जैसी नहीं है.
पंजाब
ने हाल ही में ईशनिंदा क़ानून में बदलाव किया है. वहां आईपीसी में एक नया
सेक्शन 295 AA जोड़ दिया गया है. टीवी चैनलों के कुछ एंकरों ने हफ़्तों तक
स्क्रीन पर 'एक देश एक क़ानून' जैसी सुर्खियां फ़्लैश की, ये उनकी अज्ञानता
को दिखाता है. देश के बारे में भी और क़ानून के बारे में भी.
मैं ये समझता हूं कि 'वन नेशन वन लॉ' की मुहिम चलाने वालों को लॉ कमीशन की इस रिपोर्ट से थोड़ा-बहुत झटका ज़रूर लगा है.
हां, मैं ये मानता हूं लड़के और लड़कियों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र
बराबर यानी 18 साल करने की लॉ कमीशन की सिफ़ारिश में थोड़ी समस्या है.
भारत
जैसे देश में जहां पहले ही आबादी की इतनी समस्या है, जनसंख्या विस्फोट हो
रहा है वहां लड़कों की शादी की न्यूनतम उम्र सिर्फ़ इसलिए 18 कर देना
क्योंकि लड़कियों की उम्र भी 18 है, बहुत तर्कसंगत नहीं है.
इससे ज़्यादा अच्छा होता कि लड़कियों के लिए भी शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाकर 21 साल करने की सलाह दी गई होती.
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