到不久前,美国的企业,尤其是油气生产企业还在不遗余力地打压气候行动,在他们看来,气候行动有损他们的利益。然而最近,事情有了变化。一些老牌大型企业信誓旦旦地说要完成企业用车向电动汽车的转型,并且还承诺会 %使用可再生电力。
但是,智库组织 最新的一份报告却指出,一些公司仍在积极游说政府,反对采取气候行动。那么,到底发生了什么?这些企业究竟是真的要让我们免受气候变化的影响,还是说在花样百出地打压气候行动?
同进退?
特朗普总统宣布美国将退出巴黎协定的消息一出,便遭到了美国业界领袖出奇一致的反对。各行各业的很多大公司都支持美国留在巴黎协定中,这其中就包括沃尔玛、埃克森美孚、苹果、伯克希尔·哈撒韦公司这四家最大的企业。他们的理由是,留在巴黎协定中可以保护他们参与国际市场竞争的能力。
一些企业更是实打实地押宝在清洁能源的未来。2016年美国清洁能源产业收入高达2千亿美元,与医药制造业的收入持平。伊隆·马斯克领导的特斯拉认为,未来将是电动汽车、蓄电池和太阳能的天下。
而另一方面, 认为,埃克森美孚、雪佛龙等化石燃料企业,陶氏化学公司这样的能源密集型企业、以及包括南方电力公司和杜克能源在内的公共事业企业都有着不良的“碳政策足迹”。这是因为他们反对在自己的行业内开展减排监管。在美国,大企业能够利用直接游说、政治献金、以及通过强大的行业协会等各种手段来施加政治影响。清洁能源经济转型有可能会给各行各业带来颠覆性的影响。随着消费者更多地转向电动汽车,埃克森、雪佛龙等化石燃料企业未来的市场份额将会缩小。那些未能在电动汽车领域先发制人的汽车制造商们则有可能会面临同样的困境。很多企业若不求变,就会步柯达胶片和影音租售连锁店
Blockbuster的后尘,被市场淘汰。这两家企业都是因为未能及时求变,跟上数码摄影和视频流媒体发展的步伐而惨遭市场淘汰。
对于那些力图转型、在新的领域中寻求创新的企业来说,放缓转型的步伐(而不是完全止步)未尝不是一个不错的战略,因为这可以为他们争取时间。的确,从近代史来看,大型化石燃料企业可能无法摆脱他们的核心业务。不管英国石油公司(BP)的公关活动做得多么漂亮,也永远不会像其广告语中说得那样“超越石油”( )。
低碳经济转型还会给企业生态系统带来一连串的影响,从石油钻井工人到加油站的员工都会受到牵连。能够左右政治决策的不仅仅只有大企业和投资者,在特朗普领导下的美国,就业也是政策权衡的关键,至少话是这么说的。
美国煤炭行业的衰落就是前车之鉴。一年之前,面对来自天然气行业的竞争,以及严格的环境监管,煤炭行业似乎陷入了“死亡漩涡”。
然而,特朗普总统之所以能够当选,部分原因是选民们对于煤炭行业失业率居高不下感到不满。而他的政府也在一步一步地通过瓦解奥巴马政府标志性的气候政策——《清洁电力计划》来减缓煤炭产业下滑的势头。“你们没有看到我是怎么干掉它的吗?嘭~~!没了!”特朗普总统最近在阿拉巴马州举行的一次集会上谈到这一政策时说道。政府还公布了一份有关电网可靠性的研究,这份研究可以说夸大了燃煤电厂对于稳定基载电力供应的重要性。
但对于煤炭行业的高管们来说,这些举措还不够。据报道,穆雷能源公司的首席执行官曾要求特朗普总统宣布在电网应急的情况下,燃煤电厂可以暂时不受环境法规的约束。他还要求将关闭燃煤电厂的计划推迟两年。
然而,这些举措既不能扭转煤炭行业的颓势,也不能帮助煤炭工人免受失去医疗和退休保障的威胁。对于规模更大的油气产业来说,这样一次拖泥带水的转型所带来的经济和社会影响都将是灾难性的。
气候风险
除了清洁转型过程中的掉队风险之外,一些化石燃料生产企业如今还有可能因为破坏气候而背负法律责任。本月,加利福尼亚州沿海地区的三个社区就将石油、天然气、煤炭行业的37家企业告上法庭,要求他们对自己生产的化石燃料产品所造成和促成的全球变暖及海平面上升而引发的损害承担法律责任。
除了这些问题之外,哈维和厄玛两场飓风也暴露了人们在面对强度更高的风暴和降雨时的准备不足。投资研究机构摩根士丹利资本国际公司( )的一份报告详细分析了电力生产企业、炼油厂、化工和材料行业所面临的巨大的洪涝灾害风险。
例如,杜克能源和斯卡纳公司这两家能源企业13%的发电能力位于美国的东南部地区,而这些地区每年遭受洪涝灾害的风险都在1%以上。哈维飓风导致休斯顿地区洪水泛滥,而休斯顿东北方向40英里以外一座化工厂发生的大火则将这些风险切实地展现在了人们面前。根据最新披露,这家工厂隶属于法国化工企业阿科玛公司( ),阿科玛公司有22家工厂受到气候变化的影响,着火的这家工厂就是其中之一。
政府若不作为,能够促使美国各行各业严肃对待气候问题的就只有投资者了。
花旗银行在清洁能源领域投资了1千亿美元,美国银行也刚刚发行了10亿美元的清洁能源债券。除了奖励表现优异的企业之外,两家银行还向排放大户施加了更大的压力,促使他们提高未来规划的透明度。例如,董事会一致做出决议,埃克森美孚和西方石油公司两家企业必须在气候变化造成的实际影响及法律责任风险问题上提高透明度。
金钱会说话,即便是特朗普总统,可能也不得不听。
Thursday, September 27, 2018
Monday, September 3, 2018
नज़रिया: यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड- सांप भी मर जाएगा, लाठी भी नहीं टूटेगी
श में समान नागरिक संहिता (यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड) पर चल रही बहस ने एक महत्वपूर्ण मोड़ ले लिया है.
भारत के विधि आयोग ने पर्सनल लॉ और यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड को लेकर कंसल्टेशन पेपर जारी करते हुए कई सुझाव पेश किए हैं. इसके तहत कहा गया है कि यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड इस स्टेज पर न तो ज़रूरी है और न ही वांछनीय.
इस बारे में विस्तार से जानने के लिए बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद ने नैल्सार यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ के वाइस चांसलर डॉक्टर फ़ैजान मुस्तफ़ा से बात की.
लॉ कमीशन ने वही बात कही है जो मैं कई सालों से लिखता आया हूं. मेरा हमेशा ये मानना रहा है कि भारत जैसा बड़ा देश, जिसे 'विविधता' से परिभाषित किया जाता है, जो देश इतना बड़ा है कि उसे उपमहाद्वीप कहा जाता है, उस देश में यूनिफ़ॉर्म यानी एक जैसा क़ानून बनाए जाने का मक़सद नहीं होना चाहिए.
मक़सद ये होना चाहिए कि क़ानून 'जस्ट' यानी न्यायपूर्ण हो. हमें ये देखना होगा कि क्या हमारा क़ानून 'जेंडर जस्ट' है? क्या ये महिलाओं और दूसरे जेंडर के लोगों के साथ न्याय करता है? मैंने पहले भी कहा है कि हमें 'यूनिफ़ॉर्म कोड' नहीं बल्कि 'जस्ट कोड' चाहिए.
दूसरी बात ये कि अगर हमारा मक़सद क़ानून में सुधार करना है और हम एक झटके में यकायक यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की बात करेंगे तो कट्टरपंथी इस पूरी बहस को हाईजैक कर लेंगे. क्योंकि दक्षिणपंथी ताक़तें यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड को इस तरीके से इस्तेमाल करते हैं जैसे आप एक अलग पर्सनल लॉ का पालन करके बड़ा जुर्म कर रहे हैं और अब एक यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड लाकर आपको देख लिया जाएगा.
इसलिए इसके बजाय हम टुकड़ों में छोटे-छोटे सुधार करें. कभी शादी की उम्र के बारे में सुधार कर दें, कभी तलाक़ के बारे में सुधार कर दें और कभी शादी के रजिस्ट्रेशन के बारे में सुधार कर दें. इससे इतना विरोध नहीं होगा. यानी, सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.
मैं ये समझता हूं कि लॉ कमीशन ने भारत की विविधता को देखते हुए बहुत अच्छी बात कही है. यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड का मक़सद अभी बहुत दूर है.
अभी की प्राथमिकता ये होनी चाहिए कि अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ में सुधार हो. चाहे वो मुसलमानों का पर्सनल लॉ हो या हिंदुओं का या ईसाइयों का. लॉ कमीशन ने बहुत ही व्यावहारिक बात कही है.
मैंने लॉ कमीशन के पूर्व चेयरपर्सन जस्टिस चौहान के साथ काम किया है. वो बहुत सुलझे हुए शख़्स हैं, उन्होंने बहुत अच्छी रिपोर्ट दी है.
सरकार अगर वाक़ई पर्सनल लॉ में सुधार करना चाहती है तो उसे लॉ कमीशन का सुझाव मानना चाहिए.
मिसाल के लिए, हिंदू कोड बिल की बात करें तो यह साल 1954-55 में बना लेकिन इससे पहले साल 1941 में 'हिंदू लॉ रिफ़ॉर्म कमेटी' बनाई गई थी जिसकी रिपोर्ट आई और उस पर बहस हुई.
रिपोर्ट की सिफ़ारिशें एक बार में पास नहीं हो पाईं. डॉक्टर आंबेडकर उस वक़्त क़ानून मंत्री थे और वो उसे पास नहीं करा पाए. उसे तीन बार में पास करवाया गया.
डॉ. आंबेडकर पर ये आरोप लगाए गए कि वो हिंदू धर्म को ख़त्म करना चाहते हैं, वो बदला ले रहे हैं. इससे ये पता चलता है कि सुधार मुश्क़िल ज़रूर होते हैं.
इतने समय से यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की बात हो रही है लेकिन 70 सालों में कोई सरकार इसका एक ड्राफ़्ट नहीं पेश कर पाई. अगर आप वाक़ई मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार करना चाहते हैं तो पहले एक एक्सपर्ट कमेटी बनाइए, जैसा हिंदू कोड बिल के लिए बनाया गया.
इसलिए पहले एक कमेटी बनाइए, उसकी सिफ़ारिशें आने दीजिए. उस पर बहस होने दीजिए और अगर बदलाव लागू होने तय होते हैं तो उन्हें लागू करिए. अगर ये सब उस समुदाय के साथ मिलकर होगा तो उसकी स्वीकार्यता बहुत बढ़ जाएगी. हज क़ानून बदलने से समाज में तब्दीली नहीं आती. अगर समाज में तब्दीली लानी है तो उसके लिए समाज को तैयार करना होगा, समाज को शिक्षित करना होगा. हमने उस समाज को शिक्षित करने के लिए कौन से कदम उठाए हैं, वो अभी साफ़ नहीं है.
अगर हम सच्चे दिल से, समाज में ध्रुविकरण किए बिना पर्सनल लॉ में रिफ़ॉर्म करना चाहते हैं तो पहले एक एक्सपर्ट कमेटी बनाएं और उस पर सार्वजनिक रूप से बहस हो. इन सबके बाद ही हम यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की ओर बढ़ सकते हैं.
यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड समवर्ती सूची का हिस्सा है, यानी उस पर केंद्र भी क़ानून बना सकता है और राज्य भी. यानी भारत के 29 राज्यों में 29 अलग-अलग क़ानून हो सकते हैं.
हम समझते हैं कि हिंदू लॉ पूरे देश में एक जैसा है, लेकिन वो नहीं है. क्रिमिनल लॉ भी पूरे देश में एक जैसा नहीं है, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) भी पूरे देश में एक जैसी नहीं है.
पंजाब ने हाल ही में ईशनिंदा क़ानून में बदलाव किया है. वहां आईपीसी में एक नया सेक्शन 295 AA जोड़ दिया गया है. टीवी चैनलों के कुछ एंकरों ने हफ़्तों तक स्क्रीन पर 'एक देश एक क़ानून' जैसी सुर्खियां फ़्लैश की, ये उनकी अज्ञानता को दिखाता है. देश के बारे में भी और क़ानून के बारे में भी.
मैं ये समझता हूं कि 'वन नेशन वन लॉ' की मुहिम चलाने वालों को लॉ कमीशन की इस रिपोर्ट से थोड़ा-बहुत झटका ज़रूर लगा है.
हां, मैं ये मानता हूं लड़के और लड़कियों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र बराबर यानी 18 साल करने की लॉ कमीशन की सिफ़ारिश में थोड़ी समस्या है.
भारत जैसे देश में जहां पहले ही आबादी की इतनी समस्या है, जनसंख्या विस्फोट हो रहा है वहां लड़कों की शादी की न्यूनतम उम्र सिर्फ़ इसलिए 18 कर देना क्योंकि लड़कियों की उम्र भी 18 है, बहुत तर्कसंगत नहीं है.
इससे ज़्यादा अच्छा होता कि लड़कियों के लिए भी शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाकर 21 साल करने की सलाह दी गई होती.
भारत के विधि आयोग ने पर्सनल लॉ और यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड को लेकर कंसल्टेशन पेपर जारी करते हुए कई सुझाव पेश किए हैं. इसके तहत कहा गया है कि यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड इस स्टेज पर न तो ज़रूरी है और न ही वांछनीय.
इस बारे में विस्तार से जानने के लिए बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद ने नैल्सार यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ के वाइस चांसलर डॉक्टर फ़ैजान मुस्तफ़ा से बात की.
लॉ कमीशन ने वही बात कही है जो मैं कई सालों से लिखता आया हूं. मेरा हमेशा ये मानना रहा है कि भारत जैसा बड़ा देश, जिसे 'विविधता' से परिभाषित किया जाता है, जो देश इतना बड़ा है कि उसे उपमहाद्वीप कहा जाता है, उस देश में यूनिफ़ॉर्म यानी एक जैसा क़ानून बनाए जाने का मक़सद नहीं होना चाहिए.
मक़सद ये होना चाहिए कि क़ानून 'जस्ट' यानी न्यायपूर्ण हो. हमें ये देखना होगा कि क्या हमारा क़ानून 'जेंडर जस्ट' है? क्या ये महिलाओं और दूसरे जेंडर के लोगों के साथ न्याय करता है? मैंने पहले भी कहा है कि हमें 'यूनिफ़ॉर्म कोड' नहीं बल्कि 'जस्ट कोड' चाहिए.
दूसरी बात ये कि अगर हमारा मक़सद क़ानून में सुधार करना है और हम एक झटके में यकायक यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की बात करेंगे तो कट्टरपंथी इस पूरी बहस को हाईजैक कर लेंगे. क्योंकि दक्षिणपंथी ताक़तें यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड को इस तरीके से इस्तेमाल करते हैं जैसे आप एक अलग पर्सनल लॉ का पालन करके बड़ा जुर्म कर रहे हैं और अब एक यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड लाकर आपको देख लिया जाएगा.
इसलिए इसके बजाय हम टुकड़ों में छोटे-छोटे सुधार करें. कभी शादी की उम्र के बारे में सुधार कर दें, कभी तलाक़ के बारे में सुधार कर दें और कभी शादी के रजिस्ट्रेशन के बारे में सुधार कर दें. इससे इतना विरोध नहीं होगा. यानी, सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.
मैं ये समझता हूं कि लॉ कमीशन ने भारत की विविधता को देखते हुए बहुत अच्छी बात कही है. यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड का मक़सद अभी बहुत दूर है.
अभी की प्राथमिकता ये होनी चाहिए कि अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ में सुधार हो. चाहे वो मुसलमानों का पर्सनल लॉ हो या हिंदुओं का या ईसाइयों का. लॉ कमीशन ने बहुत ही व्यावहारिक बात कही है.
मैंने लॉ कमीशन के पूर्व चेयरपर्सन जस्टिस चौहान के साथ काम किया है. वो बहुत सुलझे हुए शख़्स हैं, उन्होंने बहुत अच्छी रिपोर्ट दी है.
सरकार अगर वाक़ई पर्सनल लॉ में सुधार करना चाहती है तो उसे लॉ कमीशन का सुझाव मानना चाहिए.
मिसाल के लिए, हिंदू कोड बिल की बात करें तो यह साल 1954-55 में बना लेकिन इससे पहले साल 1941 में 'हिंदू लॉ रिफ़ॉर्म कमेटी' बनाई गई थी जिसकी रिपोर्ट आई और उस पर बहस हुई.
रिपोर्ट की सिफ़ारिशें एक बार में पास नहीं हो पाईं. डॉक्टर आंबेडकर उस वक़्त क़ानून मंत्री थे और वो उसे पास नहीं करा पाए. उसे तीन बार में पास करवाया गया.
डॉ. आंबेडकर पर ये आरोप लगाए गए कि वो हिंदू धर्म को ख़त्म करना चाहते हैं, वो बदला ले रहे हैं. इससे ये पता चलता है कि सुधार मुश्क़िल ज़रूर होते हैं.
इतने समय से यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की बात हो रही है लेकिन 70 सालों में कोई सरकार इसका एक ड्राफ़्ट नहीं पेश कर पाई. अगर आप वाक़ई मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार करना चाहते हैं तो पहले एक एक्सपर्ट कमेटी बनाइए, जैसा हिंदू कोड बिल के लिए बनाया गया.
इसलिए पहले एक कमेटी बनाइए, उसकी सिफ़ारिशें आने दीजिए. उस पर बहस होने दीजिए और अगर बदलाव लागू होने तय होते हैं तो उन्हें लागू करिए. अगर ये सब उस समुदाय के साथ मिलकर होगा तो उसकी स्वीकार्यता बहुत बढ़ जाएगी. हज क़ानून बदलने से समाज में तब्दीली नहीं आती. अगर समाज में तब्दीली लानी है तो उसके लिए समाज को तैयार करना होगा, समाज को शिक्षित करना होगा. हमने उस समाज को शिक्षित करने के लिए कौन से कदम उठाए हैं, वो अभी साफ़ नहीं है.
अगर हम सच्चे दिल से, समाज में ध्रुविकरण किए बिना पर्सनल लॉ में रिफ़ॉर्म करना चाहते हैं तो पहले एक एक्सपर्ट कमेटी बनाएं और उस पर सार्वजनिक रूप से बहस हो. इन सबके बाद ही हम यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड की ओर बढ़ सकते हैं.
यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड समवर्ती सूची का हिस्सा है, यानी उस पर केंद्र भी क़ानून बना सकता है और राज्य भी. यानी भारत के 29 राज्यों में 29 अलग-अलग क़ानून हो सकते हैं.
हम समझते हैं कि हिंदू लॉ पूरे देश में एक जैसा है, लेकिन वो नहीं है. क्रिमिनल लॉ भी पूरे देश में एक जैसा नहीं है, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) भी पूरे देश में एक जैसी नहीं है.
पंजाब ने हाल ही में ईशनिंदा क़ानून में बदलाव किया है. वहां आईपीसी में एक नया सेक्शन 295 AA जोड़ दिया गया है. टीवी चैनलों के कुछ एंकरों ने हफ़्तों तक स्क्रीन पर 'एक देश एक क़ानून' जैसी सुर्खियां फ़्लैश की, ये उनकी अज्ञानता को दिखाता है. देश के बारे में भी और क़ानून के बारे में भी.
मैं ये समझता हूं कि 'वन नेशन वन लॉ' की मुहिम चलाने वालों को लॉ कमीशन की इस रिपोर्ट से थोड़ा-बहुत झटका ज़रूर लगा है.
हां, मैं ये मानता हूं लड़के और लड़कियों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र बराबर यानी 18 साल करने की लॉ कमीशन की सिफ़ारिश में थोड़ी समस्या है.
भारत जैसे देश में जहां पहले ही आबादी की इतनी समस्या है, जनसंख्या विस्फोट हो रहा है वहां लड़कों की शादी की न्यूनतम उम्र सिर्फ़ इसलिए 18 कर देना क्योंकि लड़कियों की उम्र भी 18 है, बहुत तर्कसंगत नहीं है.
इससे ज़्यादा अच्छा होता कि लड़कियों के लिए भी शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाकर 21 साल करने की सलाह दी गई होती.
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